Hindi Kavita कुँवर नारायण द्वारा रचित ‘पगडण्डी’ एक रहस्यवादी कविता है।

Hindi Kavita कुँवर नारायण की यह कविता ‘पगडंडी’ अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ के दौर की है।‘तीसरा सप्तक’ की रहस्यवादी प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए यदि हम इस कविता को समझने का प्रयास करते हैं, तब यह कविता हमें एक आदर्श रहस्यवाद की ओर ले जाती है। 

Hindi Kavita पगडण्डी स्वयं का परिचय देती है कि- 

“रात के हौले स्पंदन में निरापद

मैं अनींद पथ हूँ।”

भावार्थ: मैं अंधेरी रात का धीरे-धीरे कंपन युक्त ऐसा मार्ग हूँ, जो निर्विघ्न (बाधा रहित) और हमेशा खुला हुआ है अथवा जगा हुआ है। Hindi kavita 

विशेष: कवि उस पगडंडी (मार्ग) के संदर्भ में चित्रण कर रहे हैं जो अंधेरे में हमेशा कंपन सह निर्विघ्न (बाधा रहित) खुला हुआ मार्ग है।यह मार्ग (पगडंडी) आंतरिक मन की शांति को पाने का मार्ग है, जो हमेशा खुला हुआ है। इस मार्ग पर कोई बाधा नहीं है। व्यक्ति जब चाहे तब परम शांति को पाने के लिए इस मार्ग (पगडंडी) की यात्रा शुरू कर सकता है। Hindi kavita 

“पूर्व से उत्तर तक,

जन-वन के आर्द्र सन्नाटे में अनायास

फेंकी हुई पगडंडी,

युग की अविराम चलित राहों से बहुत दूर

अंध-रचित गैल एक,

अकस्मात दिशा एक-

किसी देन की उदार इच्छा से अर्थपूर्ण।”

भावार्थ: मैं एक ऐसा मार्ग (पगडंडी) हूँ, जो पूर्व से उत्तर दिशा तक जाता है। मुझे समाज और प्रकृति लोक के ऐसे एकांत शांत वातावरण में अनायास रूप से फेंक दिया गया है। अर्थात मेरी उपेक्षा कर दी गई है।इस युग (समय) की स्वार्थ’ मोह’ अहंकार, व्यक्तिवादी मानसिकता, भौतिकवाद, उपभोक्तावाद मनुष्य की इन कभी न समाप्त होने वाली इच्छाओं से मैं बहुत दूर अंधेरे में रची गई एक गली (संकरा मार्ग) हूँ।  मैं संयोग से एक ऐसी दिशा हूँ, जिसका अर्थ ही उदार भाव से जीवन का अर्थपूर्ण लक्ष्य प्रदान करना है। Hindi kavita 

विशेष: कवि चित्रण करते हैं कि वह मार्ग पगडंडी सांसारिक मोह, माया, भौतिकवादी मानसिकता, स्वार्थ आदि भावनाओं से दूर है। ऐसी मानसिकता वाले लोग उस पगडंडी पर चल नहीं सकते हैं। वह आंतरिक शांति पाने का मार्ग (पगडंडी) का निर्माण अंधेरे में हुआ है। अर्थात उस पर चलने के लिए अंधेरे का (आंखें बंद करके) सहारा लेना पड़ता है क्योंकि वह पगडंडी इस अंधेरे में रची गई है।उस पगडंडी (मार्ग) की रचना संयोग से प्रकृति द्वारा इसलिए हुई है क्योंकि वह लोक के चेतन जीव को उदार भावना से जीवन का वास्तविक अर्थ समझा सके। Hindi kavita 

उस पगडण्डी पर चलते हुए कवि के अनुभव: पगडण्डी के स्वरूप का वर्णन:

“किसी गोधूलि में,

वीणा के स्वर-सी भटकती

ओ रूपवती, ज्योति के गुब्बार में

मैंने तुझे देखा है:

आज भी स्मृति वह मन के वातायन में

लौट रही किरणों की

अमित खींची रेखा है:”

भावार्थ: कवि अपने अनुभवों का चित्रण करते हुए उस पगडंडी (एकांत मार्ग) का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि-संध्या (श्याम) के समय गायों के चलने पर जो धूल उड़ती है (गोधूलि) और उस धूल पर संध्या की किरणें पढ़ने पर वह धूल स्वर्णिम (सोने जैसी) गुब्बारे की तरह दिखाई देती है और उसमें वीणा के स्वर यदि गूंजने लगे तब जो दृश्य होगा ठीक उसी प्रकार उस पगडंडी का स्वरूप है। जो बहुत सुंदर और ज्योतिर्मय (प्रकाशमय) है। वह जो अनुभव मैंने उस पगडंडी को देखकर (उसपर चलाकर) किया था उस अनुभव की यादें आज भी मेरे मन की खिड़की से लौट रही हैं और वह कभी न भुलाए जानेवाला (कभी न मिटने वाला) अनुभव है जो अमिट है। Hindi kavita 

विशेष: कवि का यह एकांत में पगडंडी का अनुभव कोई साधारण अनुभव नहीं है। व्यक्ति जब अपने अंतर्मन में धीरे-धीरे उतरता है, तब हमारे आंतरिक (भीतरी) प्रकाश के दर्शन होते हैं। (ज्योति के) उस प्रकाश को कवि गोधूलि का गुब्बारा कहते हैं। इस आंतरिक प्रकाश में वीणा के स्वर जैसी ध्वनि सुनाई देती है। यह अनुभव इतना सुंदर और आनंदमय होता है कि जिसे व्यक्ति कभी भूल नहीं पता है।

“तभी से, रहस्यमय

ओझल झनकारो में झनक रहे किरण-तार

भावार्थ: उस अनुभव के बाद तभी से उस रहस्यमय (पगडंडी) मार्ग में किरणों की तार (ऊर्जा की रेखा) विभिन्न स्वरों में झनक रहे हैं। अर्थात मेरे अनुभव अभी भी जारी है।

Hindi kavita

यहाँ से पुन: पगडण्डी अपने बारे में बताने लगती है 

धूल को भटकते जब संध्या के आँचल में-

गड़ कर रह जाते किसी चोट के निशान-सी

खींची पगडंडी हूँ।

जान-वन के आर्द्र सन्नाटे में अनायास।”

भावार्थ: मैं ऐसी पगडंडी हूँ, जैसे कि शाम के समय जब धूल को फटकाने पर वह धूल एक रेखा के रूप में भूमि पर जम जाती है और वह धूल की रेखा इस तरह होती है, मानो किसी के शरीर पर पीटने से बनी रेखा हो अर्थात यह पगडंडी भी चोट की निशान जैसी है। वह पगडंडी मनुष्य को ही नहीं बल्कि प्रकृति के हर चेतन जीव के भीतर भाव रूपी भक्ति से भीगे मन के एकांत में अनायास रूप से विद्यमान है।
विशेष: कवि कहते हैं कि जब से मुझे उस पगडंडी पर चलते हुए एकांत में आंतरिक मन का अनुभव हुआ है, तब से उस गुप्त रहस्यय में आत्म किरण की झनकारे अभी भी सुनाई देते रहती है।परम शांति पाने के लिए उस पगडंडी मार्ग कोई साधारण मार्ग नहीं है। वह चोट के निशान के समान है। अर्थात आंतरिक मन के मार्ग पर विभिन्न भावनाओं का त्याग करना आवश्यक होता है। वह मार्ग प्रकृति के सभी चेतन जीवों में अनायास रूप से विद्यमान है।

“कभी यदि-

विशाल जनसन-समूह से इस वन में आना,

कभी यदि-

दिशा-भ्रांत अपने एकांत में

मुझे खोज पाना

तो पल भर विश्वास कर मुझको अपनाना…”

भावार्थ: वह पगडंडी (आंतरिक शांति पाने का मार्ग) कहती है कि कभी बाहरी चकाचौंध दुनिया से अर्थात बाहरी जन समूह भौतिकवाद को छोड़कर परम शांति पाने हेतु इस पगडण्डी से होते हुए आंतरिक मन के वन में आने की कोशिश करना। यदि तुम अपने जीवन के मार्ग से भटक जाओ और भौतिकवाद, बाजारवाद, माया, मोह, सांसारिकता में उलझ जाओ और अपने जीवन के लक्ष्य के मुख्य मार्ग से ही भटक जाओ तब एकांत में शांत होकर मुझे खोजने की कोशिश करना। कुछ क्षण मुझ पर विश्वास करके (बिना विश्वास से आत्म शांति संभव नहीं है) मुझे अपनाने का प्रयत्न करना। Hindi kavita 

विशेष: पगडंडी बाहरी संसार में भटके हुए जीवों को कहती है कि कभी मुझे एकांत में खोजने का प्रयत्न करना। मैं तुझे एकांत में ही प्राप्त हो सकती हूँ बाहरी चकाचौंध में नहीं। Hindi kavita 

“मैं तुम्हें बल दूँगा आशा से चलने का,

दूँगा संकेत तुम्हें लक्ष्य तक पहुँचाने का

खोये की दुविधा से तुमको बचाऊँगा,

जीवन के राज मार्ग से तुम्हें मिलाऊँगा।

मैं अनींद पथ हूँ

एक जागते तपस्वी सा।

भटके हुए चरणों की आहत प्रतीक्षा में।

किसी देन की उदार इच्छा से अर्थपूर्ण।”

भावार्थ: आंतरिक शांति मार्ग (पगडण्डी) कहता है कि जब तुम मुझे अपनाओगे तब मैं तुझे जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करूँगा। तेरे जीवन के वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचाने के संकेत तुम्हें दूँगा और खो जाने की (सब कुछ समाप्त हो जाने की) दुविधा (मनस्थिति) से तुम्हारी रक्षा करूँगा।जब तुम मुझे अपनाओगे तब मैं तुम्हें जीवन के वास्तविक सच्चे राजमार्ग से मिलाऊँगा जो तुम्हारे वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचाता है।मैं सदा सचेत तपस्वी के समान हमेशा जगमगाता (जगी हुई) हुआ मार्ग हूँ जो सांसारिकता में भटके हुए हैं, अपने आप को भूल चुके, उनके दुख दर्द की प्रतीक्षा में सदा उदार भाव से जीवन का वास्तविक अर्थ प्रदान करने के लिए मैं सदा तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहता हूँ कि तुम कब एकांत में मेरे पास आओगे। Hindi kavita 

विशेष: वह पगडंडी, आत्म ज्योति, आंतरिक मार्ग हमेशा हमें उचित मार्ग दिखाने के लिए तैयार रहता है किंतु यह जीव, मनुष्य उसके पास जाता ही नहीं। उस आंतरिक मन की शांति को प्राप्त करने का प्रयास ही नहीं करता है। यदि मनुष्य मन की उस गहरी शांति को प्राप्त करने का प्रयास करता है, तब वही शांति, वही शांति का मार्ग (पगडंडी) हमारे समक्ष जीवन की सफलताओं की संभावनाओं को खोल देता है। हमें इस मानव जन्म के वास्तविक उद्देश्य से मिला देता है और मनुष्य को सफल बना देती है। Hindi kavita 

शब्दार्थ

स्पंदन-कंपन, निरापद-निर्विघ्न-बाधारहित, अनींद-हमेशा जगी हुई, पथ-मार्ग, आर्द्र-भीगा हुआ, सन्नाटा-शांत, चलित-चलनेवला, अविराम-बिना रुके, अंध रचित-अंधेरे में बनायी गयी, गैल-गली, अकस्मात-अचानक, अर्थपूर्ण-सार्थक, भटकती-भ्रमण, विचरण, रूपवती-सुंदर, स्मृति-याद, वातायन-झरोखा, खिड़की, अमिट-कभी न मिटनेवाला, रहस्यमय-गुप्त, अस्पष्ट, ओझल-छिपा हुआ, आँचल-गोद, दिशाभ्रान्त-रास्ते से भटका हुआ, एकांत-जहाँ कोई न हो, आहत-दुखी प्रतीक्षा-इंतजार, फटकना-हिलाकर दूर करना अलग करना Hindi kavita 

प्रस्तुत कविता का वास्तविक अर्थ:

Hindi kavita पगडण्डी आंतरिक मन में शांति पाने का (आत्म शांति) मार्ग है।और मनुष्य को बाहरी सांसारिकता से हटकर कभी उस मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। Hindi kavita 

प्रस्तुत कविता का साधारण अर्थ: 

Hindi bhasha पगडण्डी एक उपेक्षित भुला दी गई जानता है लेकिन वही जनता वास्तविक है। बाजारवाद, व्यक्तिवाद, संग्रहवाद, पूंजीवाद, भौतिकवाद जब तक उस पगडण्डी (जनता) के महत्व को नहीं समझेगा तब तक अपने आदर्श रूप को भी प्राप्त नहीं कर पाएगा। जब बाहरी भौतिकवाद की मानसिकता उस जनता को अपनाएंगी तब वहीं जनता उसे बाहरी भौतिकवाद, पूंजीवाद को आदर्श स्थिति तक पहुंचा देगी।

प्रस्तुत कविता का तीसरा अर्थ भी निकल सकता है लेकिन यह अर्थ बहुत ही साधारण होगा।

Hindi kavita पगडंडी जनता है जो उपेक्षित है। राजमार्ग राजनेता है और राजनेता जब जनता के भलाई के बारे में सोचेंगे तभी जनता उसे सफल बनाकर शासक भी बन सकती है।

आप यहाँ रश्मिरथी के दूसरे अंक को व्याख्या सहित पढ़ सकते हैं

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