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प्रकृति

रात की निर्जनता का सृजन कोई बतला दे !इस उदासता और कठोरता का मर्म कोई बतला दे !!सात समन्दर की…

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शकुन्तला

दुर्वाशा के वचनो का ना था उन्हे ज्ञान !वह सुन रही थी पक्षियो का सुरीला गान !!दुर्वाशा ने क्रोधित होकर…

Posted in कविता गीत कविता बाल कविता बाल साहित्य मेरी माँ और मैं हिन्दी साहित्य मंच

मेरा परिचय

पता नही क्यू मै अलग खङा हूं दुनिया से !अपने सपनो को ढूढता विमुख हुआ हूं दुनिया से !!पता नही…

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हम कैसे जिये

हम इस दुनिय मे कैसे जिये, रात जैसे अंधेरे मे हम कैसे चले !हम हिंदी निबंध आगे तो है साफ लेकिन,पिछे की…